जनता की जिंदगी भर की पूंजी दांव पर
दिल्ली-एनसीआर में आम आदमी का सबसे बड़ा सपना होता है—अपना घर। लेकिन इस सपने की राह में आए दिन ऐसे बिल्डर खड़े हो जाते हैं, जिनकी नजर सिर्फ लोगों की मेहनत की कमाई पर होती है। लोग अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी इन प्रोजेक्ट्स में लगा देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें मिलता है धोखा, सालों की देरी और कोर्ट-कचहरी के चक्कर।
सबसे गंभीर बात यह है कि इस खेल में सिर्फ लालची बिल्डर ही शामिल नहीं होते, बल्कि सरकारी अफसर भी पैसे और राजनीतिक रसूख के आगे झुक जाते हैं। बिना नियमों का पालन किए नक्शे पास कर दिए जाते हैं, फर्जी कंपनियों को अनुमति मिल जाती है और अंत में चूना केवल आम जनता को लगता है।

KDMG बिल्डर मनोज गोयल का नया घोटाला!
फर्जी नक्शे पर ‘त्रिलोक पुरम ग्रीन्स’ में करोड़ों की ठगी का खेल
नोएडा/गाजियाबाद। रियल एस्टेट सेक्टर में धोखाधड़ी का एक और बड़ा मामला सामने आया है। गाजियाबाद के गोविंदपुरम में लाखों रुपए बुकिंग लेकर प्रोजेक्ट अधूरा छोड़ चुके KDMG ग्रुप के चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) मनोज गोयल पर अब नए प्रोजेक्ट में धांधली का आरोप है।

सूत्रों के अनुसार, गोयल ने ग्रेटर नोएडा वेस्ट में ‘KDMG त्रिलोक पुरम ग्रीन्स’ नाम से नया प्रोजेक्ट शुरू किया है। आधिकारिक वेबसाइट पर इस प्रोजेक्ट का नाम Analox Town Planners Pvt. Ltd. से रजिस्टर्ड दिखाया गया है। लेकिन जांच में खुलासा हुआ है कि इस प्रोजेक्ट का नक्शा जिला पंचायत गौतमबुद्ध नगर से फर्जी तरीके से पास कराया गया, जबकि कानून के मुताबिक इस इलाके में केवल ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को ही नक्शा पास करने का अधिकार है।
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि यह काम राजनीतिक रसूख और अफसरों की मिलीभगत के जरिए किया गया। इसका सीधा मतलब है कि एक बार फिर सैकड़ों परिवारों की गाढ़ी कमाई खतरे में है।
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मनोज गोयल और KDPMGI ग्रुप पर पुराने गंभीर आरोप
यह पहली बार नहीं है कि मनोज गोयल और उनकी कंपनियों का नाम विवादों और घोटालों में सामने आया हो।
1. इनकम टैक्स सर्च (2014)
आयकर विभाग ने सितंबर 2014 में KDP/MGI ग्रुप के ठिकानों पर सर्च और सीज़र ऑपरेशन चलाया था। इस केस में प्रॉपर्टी बिक्री के नाम पर लिए गए एडवांस को अनएक्सप्लेंड कैश क्रेडिट मानकर कार्यवाही की गई थी।
2. चेक बाउंस केस (Negotiable Instruments Act, 138)
मनोज गोयल का नाम सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे एक विवाद में भी सामने आया। यह मामला M/s Gimpex Pvt. Ltd. के साथ चेक बाउंस से जुड़ा था। चेक बाउंस होना एक क्रिमिनल ऑफेंस है और इसमें गंभीर कानूनी कार्यवाही होती है।
3. MGI Gharaunda प्रोजेक्ट (राज नगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद)
2011 में लॉन्च और मार्च 2014 तक पजेशन का वादा।
2018 में FIR दर्ज हुई, क्योंकि पजेशन चार साल से ज्यादा लेट हुआ।
FIR में मनोज कुमार गोयल और कविता रानी गोयल समेत कई डायरेक्टर्स के खिलाफ धोखाधड़ी (420 IPC) और क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट (406 IPC) के तहत मामला दर्ज हुआ।
4. KDP Grand Savanna प्रोजेक्ट (राज नगर एक्सटेंशन)
मार्च 2012 तक पजेशन का वादा था, लेकिन नहीं मिला।
उपभोक्ताओं ने केस किया और 2018 में स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रेड्रेसल कमीशन (SCDRC) ने बिल्डर को 3 महीने में पजेशन और मुआवजा देने का आदेश दिया।
बिल्डर ने आदेश नहीं माना, तो मामला नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रेड्रेसल कमीशन (NCDRC) तक गया।
कोर्ट ने अंत में जिलाधिकारी को रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया।
यह प्रोजेक्ट UP RERA (UPRERAPRJ6613) में रजिस्टर्ड है।
कोर्ट ने बिल्डर को Completion Certificate (CC) और Occupancy Certificate (OC) 60 दिनों में देने का आदेश भी दिया था।
OC/CC न मिलना साफ संकेत है कि बिल्डर ने निर्माण स्वीकृत नक्शे या नियमों के अनुसार नहीं किया था।
पीड़ितों की पुकार
एक निवेशक ने कहा—
> “हमारी खून-पसीने की कमाई इस बिल्डर ने लूट ली। न घर मिला, न पैसा। और आज वही आदमी नए नाम से नया प्रोजेक्ट बेच रहा है।”
दूसरे खरीदार बोले—
> “सरकार और अथॉरिटी सब जानती हैं, लेकिन किसी ने कार्रवाई नहीं की। आखिर हम न्याय के लिए कहां जाएं?”
आखिर सवाल यह है…
जब कानून साफ है कि ग्रेटर नोएडा वेस्ट में नक्शा केवल ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ही पास कर सकती है, तो जिला पंचायत ने यह फर्जीवाड़ा कैसे कर दिया?
क्यों हर बार आम जनता को ही अपनी मेहनत की कमाई गंवानी पड़ती है?
कब तक सरकार और सिस्टम इन बिल्डरों को संरक्षण देते रहेंगे?










